Wednesday, May 6, 2009

प्रकृति के तीन गुण

श्री कृष्ण ने प्राणियों के भ्रम और मोह का कारण, प्रकृति के तीन गुणों को कहा है. इस भ्रम या मोह स मुक्ति प्राप्त करने की चेष्टा को ही कर्म कहते है. कर्म की सफलता, जिस स और, भ्रम या मोह का क्षय हो रहा हो, वह मार्ग ही धर्म है. कर्म के प्रभाव द्वारा इस क्रमिक परिवर्तन को वर्ण का अर्थात रंग या स्वभाव का परिवर्तन कहते हैं.
एक कलाकार मूर्ति या चित्र बनाता है. एक साहित्यकार या वैज्ञानिक शब्दों स या गणित की भाषा में ग्रथ की रचना करता है. एक शिल्पी या इंजिनियर, उद्योग के लिए निर्माण करता है. एक व्यक्ति खेती कर अन्न उगाता है, और भोजन बना सकता है. एक गाय दूध देती है, सांप का स्वभाव भय और रक्षा के लिए विष पैदा करता है. एक व्यक्ति ठग विद्या, मनोरंजन कर, या शिकार कर, अपना प्रदर्शन करता है.
श्री कृष्ण ने कर्ता और कर्म-फल के सम्बन्ध के इस रहस्य को यह कह कर बताया कि कोई भी कर्म-फल, कर्ता का नहीं है. प्रकृति के गुण ही मनुष्य को या अन्य प्राणी को कर्म के लिए विवश करते हैं. एक गाय, एक सांप, एक वैज्ञानिक की बुद्धि, व्यवसाई की बुद्धि अलग अलग होती है. इस लिए सब के कर्म-फल भी अलग अलग होंगे. भारत में सरकारी लोंग कितने दुष्ट होते हैं, किन्तु सेवा स अलग होने के बाद तुंरत ही सज्जन बन जाते हैं. अर्थात, दूषित सरकारी संगठन के प्रभाव स मनुष्य अपने पद के अभिमान के कारण पतित हो जाता है और उसका प्रभाव समाप्त होते ही, वह विकारों स मुक्त हो जाता है. इसी तरह प्रकृति के गुण का अपने ऊपर प्रभाव को न जानने स व्यक्ति उस कर्मफल को अपने द्वारा किया हुआ ही समझता है, और यही गलत समझ ही अभिमान है, कर्म करवाने वाला (संगठन तंत्र), कर्म करने वाला (प्राणी), और कर्म फल (प्रभाव या रचना ) का परस्पर अनुशासन चक्र या नियंत्रण ही प्रकृति है. प्रकृति भी एक नियंत्रण की व्यवस्था या सगठन है. इस कारण ही, संगठन में स्वतंत्र स्वभाव ( स्व +भावः ) नष्ट हो जाता है, और केवल भावः या प्रतिक्रिया के लिए विवश व्यक्ति, कर्म फल को ही देखते हैं और कर्म -बंधन में aasani स बंध जाते हैं.

श्री कृष्ण यह कहते हैं कि कर्म-फल, उस व्यक्ति के पहिचान का सिर्फ एक माध्यम है. इसे वे रज, या धूल या बाई प्रोडक्ट कहते हैं. यदि आग होगी तो धुआं अवश्य होगा. आग का स्वभाव सत गुण है, किन्तु उसका धुआं जो आग की तरह नहीं होता किन्तु वह आग का ही एक अवशेष या रज गुण है. इसी तरह, यदि गाय होगी तो उसके स्वभाव के अनुसार सभी पदार्थ जैसे दूध , गोबर, मूत्र लाभदायक अवश्य होंगे. गाय का दूध स मोह या उसकी चिंता करने स उसे क्या लाभ? यदि गाय हरी घास खाती है, और स्वस्थ रहती है तो दूध निकलेगा ही. किन्तु दूध के व्यापार के लिए गाय की चिंता उसका दूध उत्पादन नहीं बढाएगी. यदि गाय दूध देना बंद कर दे तो वह बिना किसी के maare ही, stan fatne स मर जायेगी. arthat गाय को अपना niyat कर्म करना ही hoga, और हर कर्म का फल भी निश्चित ही है. प्रकृति के इस नियम को न जानने वाले, जो गाय को मार मार कर या दवा देकर उसका दूध निकालते हैं, वे मूर्ख होते हैं. यदि व्यक्ति को किसी कर्मफल की जिम्मेवारी दे भी दी जाय या उसे कर्म फल के लिए मजबूर किया जाय, तो यह उसकी प्रतिभा को कुंठित कर देता है. vyavsayik या rajneetik संगठन के असंवेदनशील होने का यही रहस्य है. यही कर्म-बंधन या व्यवसाय है.

श्री कृष्ण यह कहते हैं कि जब प्राणी कर्म फल कि ओर न देखते हुए प्रकृति के गुण और उसकी व्यवस्था को देखता है, और उसके प्रभाव स होने वाली विवशता को जान लेता है, तब उसे नियंत्रण और संगठन के प्रभाव स मुक्त होने की चेष्टा के लिए कर्म करना होता है. यह ज्ञान है. फिर वह कर्म करता हुआ तरह तरह के नियत्रण स मुक्त होने लगता है. उस के कर्म फल तो होते हैं किन्तु वह उस स बंधता नहीं. इस तरह वह संगठन के या नियंत्रण में रहते हुए भी मुक्त किन्तु सावधानी स रहता है.