Thursday, December 4, 2008

नव वर्ष की शुभकामनाएं २००९

अदृश्य देवताओं के विचारों को ध्यान से श्रवण करने वाला, और उस प्रभाव को संसार में प्रत्यक्ष देखने वाला वह व्यक्ति कौन है? कौन है वह, जो गुप्त ज्ञान की उस सम्पदा को छिपाए हुए, अपने सुहृदय और तीव्र बुद्धि के बल से प्रभावशाली लेखक या, साहित्यकार या शिक्षक बन जाता है। क्योंकि, केवल उसी नियत कार्य से वह व्यक्ति शांत और संतुष्ट रह सकता है। और जब तक वह गुप्त ज्ञान, पात्र लोगों तक नहीं पहुंचता, तब तक उसकी मुक्ति सम्भव नहीं। अध्यात्मिक अर्थात अधि - भौतिक और अधि - आत्मिक, या जो व्यक्ति भौतिक और आत्मिक लोकों के बीचों -बीच में स्थित है, उन शिक्षकों, साहित्यकारों और लेखक को मेरा नव वर्ष २००९ के आगमन पर अभिनंदन ।

कृष्ण गोपाल ५/१२/०९

कृष्ण अर्जुन संवाद

संवाद जिसे अंग्रेजी में कमुनिकेशन कहते हैं, किसी विचार, घटना, व्यवस्था या व्यक्ति का चित्रण मात्र नहीं है। संवाद का अर्थ है, सह वास या उप वास या उपासना (उप आसन) या, जिसे हिन्दी भाषा में, साथ रहना (सह वास), समीप में रहना (उप वास) या समीप में बैठना (उप आसन) भी कहते हैं। इन सभी शब्दों का अर्थ एक ही है।

संवाद एक दूसरे के बीच हो ही नहीं सकता, क्योंकि इस तरह समीप में बैठना (उपासना), जिससे दोनों की दृष्टि एक दूसरे को कभी न देखे बल्कि दोनों का एक स्थान से देखना या दृष्टि की एकाग्रता या समानता (अंग्रेजी में, पॉइंट्स आफ व्यू का अलाइन्मेंट ) की स्थिति ही संवाद है। उदाहरण के लिए, एक वस्तु या स्थिति को अलग अलग दृष्टि-कोण से देखा जाता है, और इस तरह देखने वालों का चित्रण और समझ अलग अलग हो जाते हैं। इन अलग अलग परिदृश्य (चित्रण) के कारण ही विभिन्न दर्शकों के बीच वाद -विवाद होता है और समझ में हुयी इस अविश्वास की कठिनाई से डर पैदा होता है, जिससे युद्ध तक भी हो सकते हैं। संवाद केवल तब होता है, जब दोनों की मानसिक स्थिति में समीपता होगी, और दृष्टिकोण, जिसे अंग्रेजी में पॉइंट आफ व्यू कहते है, एक हो जाता है। दृष्टिकोण के बदलने की क्रिया का ज्ञान, संवाद या उपासना या कमुनिकेशन के लिए आवश्यक है। जो अपना दृष्टि कोण बदल नही सकते और दूसरों को दृष्टि कोण दोष से बचा भी नही सकते, वे लाचार प्राणी डर कर युद्द करते हैं।

एक शिक्षक या साहित्यकार या लेखक या संत तभी प्रभावशाली बन पाते हैं जब उनका अपना कोई दृष्टिकोण नहीं होता। वे किसी भी व्यक्ति की उपासना अर्थात स्वतः उसके समीप जा कर उसके ही दृष्टिकोण से देख कर उससे संवाद करने में सफल हो जाते हैं। विचारों द्वारा चलने में असमर्थ व्यक्ति अपना दृष्टिकोण बदलने में असमर्थ होता है। एक लाचार या अपंग व्यक्ति की तरह वह केवल वही जान सकता है, जो उसे दिखेगा या उसे जिसका अनुभव है। इस लाचारी को अंहकार भी कहते हैं। अहंकारी व्यक्ति, एक फोटोग्राफर की तरह है, जो अपने चित्र से बंधा होता है, और लोग उसे उसके चित्र से ही जानते हैं। उपासना करने में, अहंकारी, इसलिए ही असमर्थ होता है। श्री कृष्ण ही केवल उपासक हैं। वे हर व्यक्ति के समीप जा, उसके दृष्टि कोण से ही देखने और समझने की योग्यता रखते हैं। श्री कृष्ण ने भगवत गीता का ज्ञान दे कर अर्जुन को इस योग्य बना दिया था जिससे वे दृष्टि कोण के बंदीग्रह से मुक्त हो सके और मोह या पूर्वग्रह या अंहकार को नष्ट कर, उन्हें अपने कर्म का बोध हुआ। अतः, अंहकार रहित श्री कृष्ण का कोई अपना दृष्टिकोण या निवास तो हो ही नही सकता। संवाद में दक्ष व्यक्ति ही प्रभाव शाली शिक्षक, संत, साहित्यकार, लेखक हो सकते हैं क्योंकि न तो उनका कोई दृष्टिकोण होता है, और न ही उन्हें अपने ज्ञान का अंहकार ही हो सकता है। उनकी बातों को समझ पाना भी आसन नहीं होता क्योंकि उनका दृष्टि कोण बदलता रहता है, जबकि वह स्वयं कभी नहीं बदलते।

स्वयं को जानते हुए, दृष्टिकोण बदलने में समर्थ और समस्त प्राणियों से उपासना या संवाद में लगे व्यक्ति, जिस साधन का प्रयोग करते हैं, उसे ज्ञान कहते हैं। ज्ञान से, अंहकार अर्थात चलने या स्थिति परिवर्तन की असमर्थता, या दृष्टिकोण के न बदल न पाने की असमर्थता नष्ट होती है। ज्ञान को साधन बना कर अंहकार से मुक्ति पाने की इस क्रिया को साधना कहते हैं। श्री कृष्ण एक साधक हैं जो सदैव साधना या मानसिक यात्रा में ही रहते हैं। अनिकेत या जिसका कोई निवास स्थान न हो, अर्थात उसका अपना कोई दृष्टिकोण न हो, वही उपासक (या उपासना में समर्थ व्यक्ति) श्री कृष्ण हैं। कृपया जानें, कोई कैसे अपने ही दृष्टिकोण के बंदीग्रह से मुक्त हो और वह किस तरह समस्त प्राणियों से संवाद कर सकेगा। यही रहस्य है, क्यों एक शिक्षक या साहित्यकार या संत को उसके व्यक्तित्व, वस्तु या विषय या चित्रण के द्वारा कभी जाना नही जा सकता।

आसन का अर्थ शारीरिक अभ्यास नहीं है। साधना या दृष्टिकोण बदलने की क्रिया में दृष्टा की स्थिति भी बदलती रहती है। स्मृति एक जड़ता है जिसे अंग्रेजी में इनर्शिया कहते हैं। स्मृति के कारण द्रष्टा की दिशा या गति में अपरिवर्तनशीलता या स्थिरता या जड़ता आ जाती है। यह प्रकृति का प्रभाव है। आसन के दृढ होने का अर्थ है स्मृति के प्रभाव से ज्ञान (साधन) की रक्षा। आसन के अभ्यास से स्मृति नष्ट नहीं होती बल्कि स्मृति ज्ञान में सहायक हो जाती है। आसन को अंग्रेजी भाषा में डिसिप्लिन कहते हैं, जिसे हिन्दी और संस्कृत में अनु शासन कहते हैं। स्वयं पर शासन को अनु शासन कहते हैं। इस कारण ही आसन पर दृढ होना या अनुशासन, साधना या साधन पर बैठ कर यात्रा, को सरल बना देता है। डर का कारण पूर्वाग्रह है। सांप से डरने का कारण सांप के प्रति हमारी ग़लत धारणा है। समय साक्षी है किस तरह इतिहास के दुरूपयोग से ही सदैव युद्ध होते आए हैं। स्मृति में हुए लगातार प्रदूषण या स्मृति दोष के कारण ही डर पैदा होता है। डर ही, जड़ता या इनर्शिया का कारण है जिससे व्यक्ति अंपने दृष्टिकोण को छोड़ नही पाता और अहंकारी बन कर जीता है। अनु-शासन से व्यक्ति की बुद्धि, स्मृति को पवित्र करती है; और उस स्मृति स्थल पर वह शुद्ध आध्यात्मिक आसन बनता है, जहाँ श्रम, डर या हिंसा या प्रतिक्रिया की आवश्यकता नहीं होती, और ध्यान (उपासना की योग्यता) स्वतः सुलभ हो जाती है। प्रकृति के अनुसार कर्म से श्रम / अरुचि का अभाव हो जाता है, और यही आश्रम है। अध्यात्मिक एक अवस्था है जिसमें व्यक्ति एक ही समय में अधि- भौतिक और अधि-आत्मिक (दोनों लोकों के बीच में स्थित) होता है।

योग का अर्थ है पूर्णता, या अलग न होना। योग, युग, यज्ञ या विनियोग, आत्मशुद्धि की क्रिया है। सत् युग अर्थात सत्य का अनुभव, या सच्चाई, निस्वार्थ या प्रेम से जुड़ना। प्रकृति और पुरूष का भेद ही द्वापर युग है। पुरूष का प्रकृति के तीनो गुणों का ज्ञान ही त्रेता युग है। कल युग अर्थात ज्ञान के प्रकाश का न होना, और अंहकार, तर्क व् अविश्वास से जुड़ना। समय और काल की अनुभूति जुडाव की विभिन्न प्रकृति पर निर्भर है । समय, दो धटनाओं के बीच का नाप तौल का प्रमाण नहीं होता। ज्ञान से ही योग होता है। यदि आपकी पेन्सिल खो गई है, तो, उसकी पुनः प्राप्ति में लगने वाले समय को आप कैसे जान सकते हैं? जब तक स्मृति या खोज की विधि का ज्ञान नही होगा, तब तक घड़ी द्वारा समय देखते रहने से, पेन्सिल की प्राप्ति (का युग या योग) कभी भी नही होगा। इसी तरह, सत् युग का आना ज्योतिष (ग्रहों की गति से समय के आकलन ) द्वारा समय की प्रतीक्षा करने से कभी पूरा नहीं हो सकता। जबकि ज्ञान से व्यक्ति या समाज का युग परिवर्तन कभी भी हो सकता है। किसी दो घटना या दो व्यक्ति के दृष्टिकोण का मेल कभी शीघ्र हो जाता है, और कभी उसमें बहुत समय लगता है, इस लिए समय की परिभाषा, युग (प्राप्ति, अर्थात मिलने) पर निर्भर है, उसके बीच की दूरी या नाप पर निर्भर नहीं। योग या आत्म ज्ञान के लक्ष्य की प्राप्ति का सुगम मार्ग ही शास्त्र कहलाता है और वहां, काल या समय अपनी नाप तौल पर निर्भर नहीं होता। प्रकाश की गति, सूर्य या घड़ी समय के नाप के विभिन्न साधन हैं, किंतु इनसे समय की परिभाषा नहीं बन सकती।

योग का अर्थ है, जोड़ या जुड़ना लेकिन सभी से और, सभी समय जुड़े रहना और ध्यान और चिंतन की विविधता का विस्तार। अविश्वास, द्वेष, विस्मृति, त्याग या अलगाव कभी योग नही हो सकते। बल्कि, श्री कृष्ण ने अर्जुन को स्मृति के पुनर्प्राप्ति पर बधाई दिया। एक उदाहरण के लिए एक माँ घर में एक ही समय बहुत बातों पर एक साथ ध्यान देती है। खाना बनाते हुए, वह बच्चे पर उतना ही ध्यान रखती है, टीवी भी देखती है, और घर में आने-जाने वाले पर भी बराबर ध्यान रखती है। इस जोड़ में कोई बंधन नहीं है किंतु प्रेम है। अतः, यही योग है। दृष्टिकोण की व्यापकता की इस स्थिति को ही योग कहते हैं। अंग्रेजी में इसे दृष्टिकोण को वान्टेज पॉइंट कहते हैं, जहाँ सारे दृष्टिकोण एक हो जाते हैं। हिन्दी और संस्कृत में ज्ञान की इस व्यापकता को सत्य कहते हैं। सत्य और अहिंसा और योग एक ही शब्द के अर्थ है। क्योंकि दृष्टिकोण की जड़ता (या अंहकार) ही हिंसा या वैमनस्य का कारण है, और ज्ञान की साधना से जब इस अंहकार से मुक्ति मिलती है तब सत्य का मार्ग मिलता है । अंहकार या दृष्टिकोण की बंदीग्रह से मुक्ति ही मुक्ति है, और इसी अंहकार के त्याग से प्रेम या सत्य या योग की प्राप्ति होती है।

श्री कृष्ण योगेश्वर हैं। उनका कोई शरीर, नाम या निवास या दृष्टिकोण नहीं है, क्योंकि वे अनंत हैं। सभी प्राणियों के उपासक वे ही हैं क्योंकि वे ही सत्य में स्थित हैं। ज्ञान, उपासना की विधि, संवाद, योग, नित्य, सत्य आदि शब्दों के नियंता भी वे ही हैं। इन शब्दों का अर्थ जानने से बुद्धि को शक्ति मिलती है, और वह स्वयं सतर्क हो कर इसका प्रयोग कर सकता है। शब्द ही अक्षर (जिसका क्षय या नाश नही होता) ब्रह्म हैं। श्री गुरु नानक देव जी ने शब्द कीर्तन की बड़ी महिमा बताई क्योंकि इन महान शब्दों का अर्थ बार बार जानने से ही बुद्धि को उसके उपयोग की शक्ति मिलती है।

कृष्ण गोपाल

७/११/०८

भ्रम और संगठनात्मक व्यवस्था

जो संवाद करने अर्थात दृष्टिकोण बदलने में असमर्थ, या दूसरों के दृष्टिकोण को अपना नहीं बना सकते, वे वाद-विवाद या तर्क से जुड़ते हैं, और अंपने दृष्टिकोण को स्थिर रखते हैं। अलग अलग दृष्टिकोण से ज्ञान की प्राप्ति का सामूहिक प्रयास ही व्यवस्था कहलाता है। इसमें व्यक्ति जड़ हो जाता है, और उसकी पहिचान उसके दृष्टिकोण या अंहकार से ही होती है। अलग अलग स्थान से देखने वालों के बीच हुए बात को ठीक से समझ कर, तर्क के द्वारा ज्ञान की एक रूप रेखा बनाई जाती है; । किंतु यदि एक नया व्यक्ति किसी नए दृष्टिकोण से उसे देखेगा और उसकी एक बात से, अभी तक का प्राप्त ज्ञान सही नही रहता, और इस तरह नए ज्ञान का जन्म होता है। यहाँ प्रमाण, तर्क या अविश्वास, ज्ञान की परीक्षा का एक मात्र प्रबल साधन है, और उपासना या विश्वास का स्थान नहीं होता। रिलेटिविटी का यही सिद्धांत है। इस से सनातन ज्ञान की प्राप्ति सम्भव नहीं है। इसके विपरीत, संवाद में, व्यक्ति का दृष्टिकोण हमेशा बदला जा सकता है, और उन्हें उनके किसी एक दृष्टिकोण से नहीं पहिचाना जा सकता, अतः उनका कोई अंहकार हो ही नहीं सकता। संवाद में योग (जुडाव) हो जाने से, किसी को किसी से किसी अपेक्षा या प्रतिफल की आवश्यकता ही नहीं होती, इसलिए युद्ध संवाद का विषय नहीं है।

भ्रम, दृष्टि कोण दोष के कारण हुए असफलता, को व्यवस्था की शक्ति से नियंत्रित करने का प्रयास है। अर्थात भ्रम एक व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति को दृष्टि-कोण बदलने की जरूरत नहीं होती, और सबको एक दूसरे पर निर्भर रह कर नियंत्रण द्वारा समाज बनता है। यहाँ अंहकार एक लाचारी नहीं बल्कि दृष्टि - कोण को बिना बदले कित्रिम व्यवस्था के द्वारा हर एक के भ्रम की रक्षा की जाती है। महा-भारत में, भीष्म का चरित्र भ्रम में रहने की यही निष्ठां है। भ्रम, एक दृष्टिकोण से बना चित्र या व्यवस्था के नियम है, जिसे बदलना कभी आसान नहीं होता। भीष्म प्रतिज्ञा, व्यक्ति के अपने दृष्टिकोण में बदलाव की असमर्थता का प्रतीक है। व्यवस्था जिसे अंग्रेजी में मनेजमेंट कहते हैं, एक नियंत्रण की वह विधा है जिस में हर एक का अलग अलग दृष्टिकोण होता है, किंतु वे उसे बदलने में असमर्थ या न चाहते हुए कित्रिम विधि से काम चलाते है। विदुर और ध्रतराष्ट्र दोनों ही भीष्म के प्रिय थे। विदुर, भीष्म से तर्क करता था, और सही - ग़लत की व्याख्या करने में समर्थ था, इसलिए भीष्म का मन विदुर के पक्ष में हमेशा था। धृत राष्ट्र , तर्क से सतर्क, या संवेदन शील नहीं था, या वह दृष्टिहीन था, किंतु संगठनात्मक व्यवस्था के बल से शक्तिशाली था। आज के युग में, सुप्रीम कोर्ट के जज जो राष्ट्र अर्थात महाभारत की संरचना के लिए बने सिद्धांत (संविधान, कांस्तितुशन ऑफ़ इंडिया) के निष्ठां से बंधे हैं, वे ही भीष्म हैं। उनकी निष्ठां भारत के संविधान के प्रति है, और जिसे वह जीवन पर्यंत छोड़ नही सकता। दुर्भाग्य है, ये जज कुछ भी नही कर सकते क्योंकि वे जिन आँखों से महा भारत अर्थात विश्व के प्रसार को देखते हैं वह सरकारी तंत्र अर्थात धृत राष्ट्र (व्यवस्था के नियम जिस पर राष्ट्र आधारित है ) अँधा है। धृत राष्ट्र के चरित्र के बारे में आगे चर्चा होगी। भारत में रहने वाले स्वतंत्र विचारक, समाज सेवी या निस्वार्थ कार्य करने वाले संवेदन शील प्राणी ही विदुर हैं, वे जब भी समाज की समस्या लेकर सुप्रीम कोर्ट में जाते हैं, तब भीष्म का मन प्रसन्न हो उठता है। किंतु, धृत राष्ट्र का मन अपने ही भाई विदुर से हमेशा मैला रहता है। सरकारी लोग हमेशा कानून का दुरूपयोग करना चाहते हैं, धृत राष्ट्र इसलिए ही विदुर के कटाक्ष से बचना चाहता है। धृत राष्ट्र न चाहते हुए भी, विदुर को राष्ट्र से निकाल नहीं सकता; क्योंकि दोनों ही भीष्म से रक्षित हैं। हालाँकि भीष्म से मजबूर कोई भी नहीं है, क्योंकि वह उस राष्ट्र की रक्षा करता है, जिसके दोनों पुत्र (धृत राष्ट्र और विदुर) एक मत नहीं हैं, और वह ख़ुद अपनी प्रतिज्ञा से बंधा है, और धृत राष्ट्र को छोड़ नहीं सकता। इस मजबूर भीष्म का कभी अपमान नहीं किया जा सकता क्योंकि वह सब कुछ जानता है, किंतु असमर्थ है, और उसे प्रतिदिन तीव्र अस्त्र की शैय्या पर सोना पड़ता है।

दृष्टिहीन होना नियंत्रण की व्यवस्था के लिए अति -आवश्यक है। असम्वेदनशील व्यक्ति ही व्यवस्था का नियंत्रक हो सकता है क्योंकि वह कित्रिम कानून की रक्षा करके ही उसका नियंत्रण बनाये रख सकता है। कानून का अँधा होना इसलिए ही आवश्यक है। कानून और व्यवस्था जिस पर राष्ट्र स्थिर होता है, उसे संस्कृत में धृत - राष्ट्र कहते हैं। धृत अर्थात जो धारण करता है, और राष्ट्र जो व्यवस्था द्वारा बनायी गई सामाजिक रचना है। महा भारत में धृत-राष्ट्र का चरित्र उसके अध्यात्मिक अंधेपन जो भीष्म अर्थात कानून और व्यवस्था के भ्रम से पोषित है, का द्योतक है। धृत राष्ट्र यद्यपि अँधा है किंतु वह जानता सब है। संजय द्वारा अर्थात मर्यादा के पालन के लिए विवश किए जाने पर, वह अध्यात्मिक दृष्टि से महाभारत के युद्ध को सद्दैव ही देखता है।

दृष्टिहीन धृत-राष्ट्र और भ्रम के पोषक भीष्म के राष्ट्र रचना में, अन्य पात्र हैं। " दुर्योधन " (दुर्र-योधन ) अर्थात कानूनी अधिकार द्वारा शासन के शक्तियों का निरंकुश दुरूपयोग जिसे अंग्रेजी में बैद अथॉरिटी को कहते हैं। " दुश्शासन" (द्दुस -शासन) या कु-शासन जिस का अंग्रेजी अनुवाद है बैद गोवेर्नांस। अथोरिटी या गोवेर्नांस के लिए अच्छा शब्द विशेषण में नही लग सकता क्यंकि नियंत्रण कभी अच्छा या निर्जीव नही रह सकता। " कर्ण " शब्द वह है जो अंग देश का शासक है अर्थात नियंत्रण करने का ढांचा या शरीर या अंग या सरकारी तंत्र (गोवेर्नांस स्ट्रक्चर ) है जो अपने पहिचान के बदले, दुर्योधन और दुश्शासन के ऋण को चुकाने के लिए बद्ध है। सरकारी लोग जो भय के प्रतीक हैं, जैसे पोलिस या टैक्स अधिकारी या मुनिसिपलिटी के अधिकारी ही दुर्योधन हैं। न्याय व्यवस्था या सड़क, बिजली, पानी या रक्षा के संगठन के मद से अमानुषी लोग ही दुश्शासन हैं। व्यवस्था के लिए संवेदन हीन क़ानून बनाने वाले मंत्री या संसद या राजनीती के लोग ही धृत राष्ट्र हैं जिन्हें संविधान (भीष्म) ने पैदा किया है। जो लोग सिर्फ़ पेट भरने और अपनी पहिचान के लिए अपनी निष्ठां को बेच चुके हैं अर्थात ऋण चुकाने के लिए धृत राष्ट्र, दुर्योधन और दुश शासन से जुड़े हैं वे ही प्राणी "कर्ण" हैं। हर संगठन चाहे वह राष्ट्र हो, परिवार, या व्यावसायिक संगठन हो, या राजनीतिक या, अन्य, ये सभी पात्र वहां मिलेंगे ।

" द्रोणाचार्य" (द्रोण +आचार्य ) वह शिक्षक है जिसका आचरण दो अलग अलग हैं। अर्थात, वह शासक का अन्न खाकर उन लोगों को अस्त्र का प्रयोग सिखाता है जिनकी मानसिकता से वह बेपरवाह है। बाज़ार की व्यवस्था के पेशेवर जैसे, तकनीक के शिक्षक या डाक्टर या वकील जो सरकार (धृत राष्ट्र) के अंग नहीं है किंतु उन पर निर्भर हैं, और उनके आचरण भी दो होते हैं। उन पर कभी आँख बंद करके भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि बाज़ार, आपका शत्रु और मित्र दोनों हैं, और उनके स्वभाव स्थिर नहीं होते। अश्वत्थामा, तकनालोजी या मशीनी युग का प्रतीक है जिसके उपयोग द्वारा कोई बल तो प्राप्त कर सकता है, बुद्धि नहीं। उदाहरण के लिए, बन्दूक या अस्त्र जिसकी रचना भौतिक शास्त्र के ज्ञान द्वारा होती है, किंतु उसके इस्तेमाल के लिए भौतिक ज्ञान में पंडित होना जरूरी नहीं है। मूर्ख व्यक्ति भी टेक्नोलोजी के हाथ आने पर बलशाली हो जाता है। टेक्नालोजी या अश्वत्थामा, अपने पिता, द्रोण आचार्य (जो बिना परिणाम को जाने शिक्षा या तकनीक का व्यवसाय करता है) की व्यावसायिक रचना है। द्रोणाचार्य के मृत्यु का कारण भी अश्व-थामा के मृत्यु का समाचार का शोक ही बना। इसका अर्थ है जो अस्त्र को बनाते हैं, उनकी मृत्यु भी उन्ही अस्त्रों के शोक से ही होती है। ऐ के ४७ बन्दूक का निर्माता रशियन आविष्कर्ता अपने ही अस्त्र के दुरूपयोग के शोक से मर गया था। अमेरिका जिस ने आण्विक अस्त्र का पहिला उपयोग किया, आज वही उसका शिकार बन सकता है। शकुनी शब्द बाजार की गणित पर शासकीय नियंत्रण और छल की निति का द्योतक है, जो अर्थ व्यवस्था में लोगों को उलझाने रखने और लालच की शक्ति को भली भांति जानता है। वित्तीय संस्थाएं, या बैंक ही शकुनी हैं। सारा महा भारत का युद्ध अर्थात बाज़ार शकुनी की ही देन है। युधिष्ठिर अर्थात जो युद्ध में स्थिर रहने की क्षमता रखता है, या धर्म पर रहता है, और विचलित नहीं होता, वह भी, बाज़ार के छल जिसका भरोसा निष्पक्ष गणित देता है, सब कुछ हार जाता है। भीष्म भी युधिष्ठिर की सहायता नहीं कर सकता क्योंकि व्यवस्था के खेल के नियम का अधिष्ठाता धृत राष्ट्र है, और वह भय (दुर्योधन), असम्वेदन शीलता (दुश्शासन) और लालच (शकुनी) पर निर्भर है। " कृपा-चार्य" शब्द उस चरित्र का परिचय है जो लोगों को अपर्याप्त मदद देकर लोगों का शासन के लिए भरोसा प्राप्त करता है और उन्हें शासन पर निर्भर बनाये रखने में सफल हो जाता है। द्रोणाचार्य और क्रिपाचार्य दोनों व्यावसायिक भाई हैं; एक, अस्त्र चलाना और युद्ध नीति सिखाता है, और दूसरा, अस्त्र से घायल हुए व्यक्ति को दवा देने की कृपा करके ठीक करता है। " जयद्रथ" वह शक्ति है जो पराजय को जीत बता कर, अश्लील दुष्प्रचार के द्वारा शासन की शक्ति को बनाये रखता है। जयद्रथ ने ही शेष पांडवों की सेना को अभिमन्यु के चक्रवियुह भेदन के समय, पीछे पीछे आने से रोका था। इसका अर्थ है की दुष्प्रचार की अधिकता से मनुष्य को अनुकर्णीय कार्य से रोक देना। जयद्रथ का ही प्रभाव है की आज भी भारत में जो व्यक्ति अकेले ही व्यवस्था से लड़ता है, किंतु सही व्यक्ति है, उसका लोग साथ नही देते हैं।

बिदुर वह है जो धृत राष्ट्र की तरह ही व्यवस्था का ज्ञाता है किंतु उसका दृष्टिकोण तर्क से शुद्ध है, और वह व्यवस्था के बुराई के विरुद्ध है। भीष्म को धृतराष्ट्र और बिदुर दोनों का सम्मान मिलता रहता है, इस लिए भ्रम की शक्ति में अच्छाई की सीमित मात्रा भी होती है।

अमेरिका में व्यक्ति महत्वपूर्ण है, संगठन नहीं। उसके संविधान में डकैत, लुटेरे और विचारक और संतों के भी दस्तखत हैं। संगठन भी एक माध्यम है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति के उत्तरोत्तर चरित्र के निर्माण के लिए होना चाहिए। इसलिए, संगठन के द्वारा विकास की सम्भावना हो भी सकती है, और नहीं भी। संगठन और समाज अलग अलग शब्द हैं। समाज, व्यक्ति की स्वतंत्रता और मौलिकता का प्रतीक है, वहां नियंत्रण नहीं होता और ज्ञान के द्वारा चरित्र निर्माण होता है। समाज (व्यक्ति की मौलिकता ) और संगठन (नियंत्रण) का युद्ध चलता रहता है, और राष्ट्र हित में यही ठीक है।

भारत के धर्म शास्त्र सांकेतिक चरित्रों द्वारा इस सत्य और सनातन ज्ञान को उसी तरह संभालते हैं, जैसे फिसिक्स के गणितीय फार्मूला के विभिन्न पात्र जिसके अलग अलग समय और स्थान पर हुए प्रयोग ही इतिहास बनते हैं, और वे अनंत काल तक लिखे जा सकते हैं। यही गीता का रहस्य है। फिसिक्स की तरह ही सांकेतिक भाषा में लिखा गया श्रीमद भगवत गीता सनातन है। यह समझना जरूरी है। पूजा करने के ढोंग के बजाय उसका अर्थ जान लेना जरूरी है। मुंबई कांड का आतंक वादी कसब भी पाँच समय रोज नमाज पढता है। इसी तरह मंदिरों में होने वाली भारी भीड़, पंडितों के दुकान या पंडों का कर्म कांड, या मंदिरों की तरह ही कोर्ट में फैले वकीलों के खोमचे, या पुराने पंडितों की कर्म कांड के बदले, आज के सरकारी कर्म कांड कभी भी धर्म का प्रतीक नहीं हो सकते। व्यक्ति को अपने स्वभाव में ज्ञान द्वारा परिवर्तन करने की आंतरिक क्रिया ही धर्म है।

भारत में द्रोणाचार्य किस्म के पंडित जिसे "धर्म निर्पेक्ष्य" कहते हैं, उसका सही अर्थ होता है "संगठन निर्पेक्ष्य" अर्थात वह राष्ट्र जहाँ हरएक व्यक्ति के मौलिकता और सह अस्तित्व के अधिकार की रक्षा होती हो। आज तक भारत में सुप्रीम कोर्ट के जजों ने (अर्थात भीष्म ने) अपनी मर्यादा को जानते हुए कभी भी अपने को इस योग्य नही समझा किवे वे धर्म को पारिभाषित कर सकते हैं जबकि वे दिन रात संविधान की निष्ठां से बंधे रह कर, नई नई परिभाषा करते ही रहते हैं। यह उनकी कृष्ण भक्ति है। अमेरिका के जज तो न्याय की प्रक्रिया से भी अपने को दूर रखते हैं, और केवल शब्दों की परिभाषा और अर्थ की व्याख्या करते हैं। तरह तरह के कोर्ट जो हर गली कूचे में पाए जाते हैं वहां ही झगडे लडाई का न्याय हो जाता है, क्योंकि वहाँ परिभाषा पर विवाद नहीं होता। अंग्रेज और अमेरिकी कानून विशेषज्ञ, शब्द ज्ञान के ही पंडित होते हैं और उसे सरल बना देते हैं जिससे न्याय प्रक्रिया बाधित न हो। संविधान का रक्षक भीष्म एक लाचार, किंतु उदार व्यक्तित्व है, उसका धर्म निष्ठां की पूर्ति है; जबकि संगठन (धृत राष्ट्र ) इतना उदार कभी नहीं होता। आज के भारत में जहाँ शिक्षा का बुरा हाल है और भाषाएँ भी अधिक हैं, वहां कानून को इसलिए कठिन बनाया जाता रहा है की वह भय और नियंत्रण का कारण बने, और उसका ज्ञान वकील या पंडितों के बिना प्राप्त न हो सके। भारत की गिनती महा भ्रष्ट सरकार वाले देशों में की जाती है। यहाँ तक की अमेरिका और ब्रिटेन के लोग जो शिक्षा में भारत से पीछे नही रहे हैं, यहाँ व्यवसाय करने को डरते हैं। हिंदू, मुस्लिम, उत्तर प्रदेश, बिजली बिभाग आदि संगठन के नाम जीवन शैली, राजनीतिक, क्षेत्रीय, भाषा या व्यावसायिक आधार पर बनाये गए हैं, किंतु भारत का संविधान "संगठन निर्पेक्ष्य" है।

कृष्ण गोपाल

Monday, November 24, 2008

MahaBharata – glossary

The reason truth is presented in symbolic manner that only it goes to the one who is Paatr or qualified (clean container) and is in need to get it. Bhagwat Gita is not a Vishay or subject (from subjection) or toxic knowledge that enters though hole of body which is recycled or refereed knowledge. Knowledge comes from a deep well of meditation, and by blessings of the one who made it.

Even simple physics has equations in electricity, mechanics, optics, cannot be easily understood without terms that these represent. For example V =IR is a mythology and V is any measurement of volt. I is any measure of current and R can take any measure of Resistance in different appliances. In similar way, unless the terms are found, it is only story and folklore or case tools, puraan or case history of pundits (called lawyers, experts) acting as memory analysis tool, and reminder how it carries it by generations in spoken tradition and only qualified people could find true meaning in far ahead time and spaces.

Kaurav and Pandav and Vidur are symbol of impure, pure and flexible attitudes. Many of the words are really simple and can be easily self realized by logical and deep thoughts and experiences by every individual of receptive minds.

Gold Au which can live in independent state, and other reactive elements who only can live in organization. Cl has lived in peace with Na and becomes NaCl, but same Cl with H has a reactive nature of HCl. This is how every organization is made of. So, the Au or Pandu has self realized satisfaction and can live in nature without reactivity. A thief, or administrator or business on the other hands needs organization. And organization is a faceless identity bound by rules and laws, rather than sensitiveness.


Why do behavior of individuals' independently and behavior of Individual in organizations differ? धर्म (व्यक्तिगत, मन ) और कर्म (बुद्धि के सांसारिक, परस्पर, संगठन में) इन दोनों के क्षेत्र में होने वाले युद्ध का शास्त्र ?

Kuru Kshetra (कुरु / संसारिक क्षेत्र ) = Work Place i.e. interaction
Dharma Kshetra (धर्म / व्यक्तिगत स्वभाव का क्षेत्र) = Place of self expression of individual

Pandu (पांडू,, पीला, सोने की सी संवेदनशीलता वाला, प्रतिक्रिया न करने वाला ) = Yellow or Gold nature which is sensitive (or highest conductiviity) but not reactive (not resistive) and thus are not part of an organization or management
Kaurav (कौरव या कोलाहल सूचक, तीव्र प्रतिक्रिया करने वाला असंवेदनशील स्वभाव ) = Chaotic or Sodium and Chloride who are reactive and can live only in organization like NaCl or, HCl or other compound
Vidur (विदुर, सतर्क = तर्क से सीखने वाला) = Criticism or arguments as means of awareness of policy matters i.e. environmental activists who saved Delhi by PIL in supreme Court (Bheeshm)

Bheeshm ( भीष्म, निश्चयी , दृढ प्रतिज्ञ, निष्ठां या जिम्मेवारी से बंधा )= Determined, protection by his/her inability to change point of view, principles i.e. Chief Justice of Supreme Court who protects Indian Constitution
Dhrat Rashtra (धृत राष्ट्र = राष्ट्र को जो धारण करे) = Upon which a nation stays or, insensitive (bind) law and order i.e. Prime Minister or Chief Executive who makes laws under Indian constitution or protection from Bheeshm
Dur yodhan (दुर योधन = बुरा अधिकारी ) (son of Dhrat Rashtra) = Bad Authority i.e. Police, Tax authorities who are known to have power to misuse law
Dush Shasan (दुश शासन = बुरा शासन ) = Bad Governance i.e., municipality, power supply, sewer lines, health care
Shakuni (शकुनी = शक या गोपनीयता या चोरी या धोखे से लाभ लेने वाला ) = Bad accountant responsible for uncertainty and thus promoting greed and speculation by monetary and fiscal policy of finncial insitution or state i.e. RBI, Banks, SEBI, BSE
Jaya Drth (जय द्र्थ = उदघोशक ) = Bad publicity or Media which stops people from following noble work. (Pandav were forbidden by him to follow Abhimanyu entering Chakraviuh )
Karna (कर्ण = शहतीर, या ढांचा, जैसे कर्णधार या ढांचा जो बोझ उठाए ) = Admnistrative Structure i.e. employees in government who work for livelihood and designation irrespective of to whom they serve
Shalya (शल्य = सर्जरी की क्रिया)= Surgial tool or internal audit for Administrative Structure which discourages Karna to not have bias or blind loyality
Drona Achrya (द्रोण आचार्य = दो आचरण जिसका हो)= a man with two character i.e., technology consultant or professor of business who teaches technology in replacement of benefits and not for suitability of student ie inventor of AK 47
Ashwa Tthaama (अश्व त्थामा = बुद्धि हीन शक्ति )= Technology or AK 47, or any knowledge embedded in product which can be used or misused
Kripa Acharrya (कृपा आचार्य = कृपा का प्रदर्शन या आचरण )= appeasement, good for nothing. कृपण व्यक्ति जब भी कुछ देता है, उसका प्रदर्शन भी करता है. प्रेम में समर्पण होता है, कृपा नहीं.


Drisht Duymn (दृष्टि द्युम्न = गतिशील नेत्र या जो भीष्म की तरह एक दिशा में ही नहीं देखता) = who has moving points of view or can see from all direction and unlike Bheeshm
Draupadi (द्रौपदी = कृष्ण को समर्पित, निरीह प्राणी) = Devotion to Truth who is without help or never dependent on the security from outside
Udh Isthir (युद्ध स्थिर = जो युद्ध में स्थिर है )= who knows Shaastra or the system and thus, stays calm in War i..e, not reacts even in war
Bheem (भीम = जितेन्द्रिय )= Self Control
Arjun (अर्जुन = निर्मल बुद्धि, पात्र )= Intelligence or intellect
Nakul (नकुल = प्राकृतिक सम्पदा से जीवन यापन, जिस से शकुनी का वध होता है) = Sustainability (or Livelihood without destruction)
Sah Dev ( सह देवा = बिना किसी नियंत्रण या भय के साथ साथ रहना ) = co-existence

KRISHNA (कृष्ण) = Truth
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Yuddha (युद्ध ) = joint activity of the research in resolving different points of view. Sri Krshna said ' fight with only deserving enemy, and not with those who can be easily disassociated". Bheesm and Arjun were deserving enemy, and this war was Dharma Yuddh.
Vijay (वि जय) = special victory, not normal victory. In normal victory called जय, one is winner over a looser, but in special victory, both sides win. That means, the points of views of both get fully shared, and differences in perspectives end.
anu shasan (अनु शासन) Parva (पर्व) = anu अनु (स्वयम ) शासन (नियंत्रण ), पर्व ( प्रदर्शन , demonstration, act of) or, Act of ( पर्व ) Self (अनु ) Control (शासन )
varn वर्ण = color चरित्र का प्रभाव जो कारण, कर्म और उसके लक्ष्य में दिखता है.
shoodra (शूद्र) = छुद्र ( छोटा ), जिसे अंहकार हो, और वह नियंत्रण चाहता हो. self serving person जो मालिक कहलाता है और इस असमानता की रक्षा के लिए वह कर्म :-> कठोर श्रम और कारण -> हार जीत, यश - निंदा और जिसका लक्ष्य : -> मृत्यु होती है. By unequal agreement, he/she wins or looses and finally dies without any achievement
vaishya (वैश्य) = विषय (recycled / second hand 'toxic' knowledge which is learnt / carefully understood from the world and not self originated) का व्यवसाय (लेन देन), कारण :-> लाभ हानि, शत्रुता, स्वार्थ और कर्म:-> जय, बुद्धि के श्रम (परिश्रम) और समानता का व्यवहार. लक्ष्य:-> स्वर्ग.
chhatria (छत्रिय ) = ज्ञान ( not just learnt and understood but the ability of research and original realization अनुभूत ज्ञान ) के लिए कारण:-> धर्म -अधर्म, ज्ञान, आश्रम (मन की वह स्थिति जहाँ श्रम या परिश्रम न हो) ; और, कर्म: युद्ध , विजय और लक्ष्य : आत्म संतुष्टि, समाधान, सावधानी, निर्भयता
brahman ब्राह्मण = कारण; सत्य / अयोध्या, जहाँ युद्ध की आवश्यकता नहीं, कर्म: प्रेम, योग और लक्ष्य :-> मोक्ष

Saturday, November 22, 2008

Yuddha Parva

आतंक की क्या परिभाषा है। क्या अस्त्र उठाना आतंक है? क्या पोलिस या सेनाएं या देवी देवता जो अस्त्र के साथ ही पूजित हैं, वे आतंक के प्रतीक हैं। क्या अस्त्र उठाने का अधिकार कोई भी किसी को दे सकता है। अर्थात, सरकारें जो न्याय, शिक्षा, अर्थ शास्त्र, और सामजिक सद्भाव के लिए देश-वासियों से अधिकृत हैं, और असहाय नहीं कही जा सकतीं, भी हिंसक होती हैं। यदि हिंसा ही सरकारों का अन्तिम अस्त्र है तो फ़िर न्याय या शिक्षा के उपकरण, और सरकारी टोटके और कर्मकांड क्या निष्प्रभावी हो गए हैं? और यदि अस्त्र का उपयोग असहाय व्यक्ति के लिए ही न्यायोचित है, तो उस असहाय व्यक्ति की क्या पहचान है? यदि किसी भी देश में आतंक बढता है, और क्या इसका अर्थ यह लगाना चाहिए कि वहां असहाय व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है, और लोगों का अपनी सुरक्षा के लिए सामाजिक सद्भाव, न्याय, शिक्षा, और सरकारी कर्मकांड पर भरोसा नहीं रहा है?

आतंक का कारण क्या भय, असहाय व्यक्ति की असुरक्षा में की गई प्रतिक्रिया है, या लालच / अधिकार का प्रदर्शन या, नौकरी की मजबूरी या, निस्वार्थ अध्यात्मिक बल की चिंगारी है ? जो आतंक वादी नहीं हैं किंतु व्यवस्था में उनका विश्वास नहीं है और डर कर जी रहे हैं, क्या वे मर (आत्म हत्या कर ) गए हैं या उन्होंने भ्रष्ट हो कर, अव्यवस्था में जीने की आदत बना ली है, और प्रतिक्रिया करने में असहाय हैं? हमें यह भी सोचना चाहिए कि हर एक भारतीय व्यक्ति किस तरह आतंक की उपयोगिता और वीरता का भाव, अपराधी और भ्रष्ट व्यवस्था से अलग अलग समझता है? दोनों ही अस्त्र उठाते हैं, किंतु उनका भाव ही यह तय करता है कि वे वीर हैं, या अपराधी हैं, या उनका यह कार्य उनके नौकरी की मजबूरी है।

कारण - व्यक्तित्व - व्यवस्था के आधार पर आतंक (वीरता या अपराध) की परिभाषा अलग अलग होती है।
अस्त्र के उपयोग के ४ कारण हो सकते हैं।
१। लालच या अधिकार की लड़ाई - लूट या डरा कर पैसे कमाना। यह एक व्यापार है, जिसमें अपराधी उस पंडित की तरह होता है जो यह कभी नहीं चाहता कि उसका यजमान मर जाए। लालची लोग उस डाक्टर की तरह होते हैं जो अपने पास आए रोगी को न तो मरने देता है, और न ही उसे पूर्ण स्वस्थ ही होने देता है। यह सबसे खरतनाक कारण है, जिसमें अपराधी असमान समझौता (unequal agreement) करने में सफल हो जाता है। असवेदन शील सरकारी भ्रष्ट तंत्र या अपराधी संगठन इसके उदाहरण हैं।
२। अलगाव के लिए युद्ध। यहाँ अस्त्र का उपयोग इसलिए किया जाता है जिसमें असमान समझौते की व्यवस्था को, उससे अलग हो कर, समाप्त करने की चेष्टा होती है। यहाँ डाक्टर अपने रोगी को छोड़ना नहीं चाहता; किंतु रोगी, डाक्टर को बिना हानि पहुंचाए अलग होना चाहता है। अस्प्रश्यता या सामजिक अलगाव या स्वतंत्रता की क्रांति इसके उदहारण हैं।
३। आत्म-रक्षा के लिए अस्त्र का उपयोग। असहाय व्यक्ति एक सीमा के बाद या तो आत्म हत्या कर सकता हैं, या वह युद्ध करेगा। असहाय होना अलगाव होने से भिन्न है, क्योंकि वह अलग नहीं रह सकता। स्टाक मार्केट में पैसे खो चुके लोग, ग्रामीण स्थानों पर रह सकते हैं, किंतु वे मार्केट को न तो छोड़ सकते हैं, और न वहां रह सकते हैं। नौकरी की मजबूरी में पोलिस या शस्त्र -बल या हिंसात्मक संगठन में काम करने वाले, स्वामिभक्त होते हैं, देश भक्त नहीं। कालांतर में यही लोग लालची हो जाते हैं।
४। जो लोग असहाय या असंतुष्ट नहीं हैं, किंतु वे अध्यात्मिक रूप से इतने संवेदन शील हैं कि दूसरों पर अन्याय या अपराध को सहन नहीं कर सकते। ये लोग न तो लालची हैं, न अलगाव वादी, न ही व्यक्तिगत हानि से असहाय हैं, किंतु वे केवल निस्वार्थ और व्यक्तिगत आस्था के भरोसे ही अस्त्र उठाते हैं। संगठन और व्यक्तिगत स्वार्थ, इनके लिए आवश्यक नहीं है। ये लोग अपने स्वभाव को छोड़ नहीं सकते, और अपने जीवन या मृत्यु का अपमान करना नहीं जानते। उनके जीवन का उद्देश्य, जीवन से भी बड़ा होता है और मृत्यु अकारण ही नहीं होती। महाभारत में अभिमन्यु का चरित्र इसका उदाहरण है।

इस तरह, हमें यह ज्ञान होना चाहिए की आतंकवादी भी चार तरह के होते हैं। लालची आतंकवादी, अलगाववादी आतंकवादी, असहाय आतंकवादी और वीर आतंकवादी। अपराध एक सम्बन्ध (relative term) है, और चारों आतंकवादी एक दूसरे के लिए अपराधी होते हैं और यह युद्ध किन्ही भी दो अपराधियों के बीच होता है। युद्ध में कानून की भूमिका नहीं होती क्योंकि कानून की मृत्यु के बाद ही युद्ध का जन्म होता है।

भारतीय समाज में यह भ्रम है की हिंदू या मुस्लिम या सिक्ख आतंकवादी हो सकते हैं। मुस्लिम और हिंदू धर्म से अलग नहीं हैं, बल्कि इतिहास से अलग हैं। मुस्लिम शासकों का इतिहास आज उस असमानता की कीमत चुका रहा है, जिसके कारण मुस्लिम आज भी समाज में उचित प्रतिष्टा न पा सके और विकास से अलग हो गए। आज के नए शासक कल के दुर्भिक्ष बनेंगे। उदाहरण के लिए, एक वकील या दरोगा या पोलिस कर्मचारी या सरकारी अधिकारी को घर किराये पर मिलना मुश्किल होता है। प्राइवेट बैंक उन्हें लोन भी नहीं देते। लोग यह सोचते हैं की ये लोग अपनी ऊंची पहुँच से घर पर कब्जा कर लेंगे या उनसे किराया लेना मुश्किल होगा। कानूनी वेश में गैर कानूनी लोग, कालांतर में समाज से बहिष्कृत कर दिए जाते हैं। यही अस्प्रश्यता का सिद्धांत है। एक अच्छा मुस्लिम, एक अच्छा वकील या एक अच्छा पोलिस कर्मचारी इस लिए अभिशिप्त है, की वह कभी असमानता का प्रतीक रहा था या है। इन्हें अपना मान लेने में वक्त लगेगा। एक पोलिस की लड़ते हुए मृत्यु होने पर समाज में इतनी चिंता नहीं होती जितनी एक सामान्य व्यक्ति की दुर्घटना से हुयी मृत्यु की । आतकवादी का नाम समाज में जाना जाता है, किंतु एक पोलिस कर्मचारी का नाम उसके मृत्यु के बाद उसका स्वामी (जो सरकारी व्यवस्था है) भी नहीं जानता। निरपराध लोग जो आतंकवाद के शिकार होते हैं, वे हिंदू या मुस्लिम या सिख नहीं होते और न ही एक आतंकवादी, हिंदू या मुस्लिम या सिख हो सकता है।

सामाजिक असमानता और कुव्यवस्था ही आतंकवाद का कारण है जिनके बनाए चक्रव्यूह में अभिमन्यु फंस चुका है। सभी उसे देख कर चिंतित हैं, क्योंकि वह एक वीर आतंकवादी है। मुझे हर एक उस व्यक्ति से सहानुभूति है जो अपने जीवन के उद्देश्य को जीवन से बड़ा मानता है। कर्नल पुरोहित या प्रज्ञा ठाकुर के कृत्य को कानून अपराधी मानता है, किंतु ये व्यक्ति न तो लालची हैं, न ही अलगाव वादी, और न ही असहाय। इन्होने अपने स्वार्थ के लिए कुछ नहीं किया। कानून एक मशीन है और वह वही करता है जो उसका मालिक चाहता है। यदि इनकी मृत्यु भी होती है, तो भी वह अपमान जनक मृत्यु न होगी। यही अभिमन्यु का चरित्र है।

मैं यह मानता हूँ की इनका (प्रज्ञा और पुरोहित) चक्रव्यूह में घुसने का रास्ता उनके लिए ठीक हो सकता है किंतु अन्य लोगों के लिए ग़लत है। अभिमन्यु ने चक्रव्यूह का भेदन करने का जो मार्ग चुना था उस पर बाकी पांडव सेना नहीं जा सकी। यदि कौरव व्यवस्था को तोड़ना ही है तो वह रास्ता अपनाना चाहिए जिसका उपयोग सार्वजनिक हो और उनका मार्ग अनुकर्णीय हो।

भारतीय राजनीति का व्यापारी स्वरुप लालच पर आधारित है, इस लिए असहाय आतंकवादी बढ़ रहे हैं। जो लोग इस व्यवस्था का विरोध करते हैं किंतु उनसे लड़ने की हिम्मत नहीं है वे सभी भ्रष्ट समाज का अंग बन जाते हैं और अपनों से लड़ते हैं। युद्ध का स्वरुप भारत में आतंक है, क्योंकि यहाँ अमेरिका की तरह विश्वसनीय न्याय व्यवस्था नहीं है। अमेरिका में लोग कानूनी लड़ाई में अभ्यस्त हैं, इस लिए वहां आतंक वाद के चारो स्वरुप कानून के दायरे में है। वहां अभिमन्यु की मृत्यु चक्रव्यूह में नहीं होती।

भारत में नौकर शाही है। यहाँ नौकर ही मालिक को कानून या न्याय या रक्षा सिखाता है। जनता जो सरकार को चुनती है सरकार के नौकर उसी जनता को मजबूर करते हैं। जब जनता, सरकार और उसके नौकरों से अपना दिया गया अधिकार वापस ले लेती है, तब वह स्वयं न्याय, रक्षा, और सद्भाव की नयी परिभाषा बनाती है। जनतंत्र और नौकरशाही में विरोध के कारण, कुव्यवस्था बढती है, और असमानता के कारण आतंकवाद बढ़ता है।