Saturday, November 22, 2008

Yuddha Parva

आतंक की क्या परिभाषा है। क्या अस्त्र उठाना आतंक है? क्या पोलिस या सेनाएं या देवी देवता जो अस्त्र के साथ ही पूजित हैं, वे आतंक के प्रतीक हैं। क्या अस्त्र उठाने का अधिकार कोई भी किसी को दे सकता है। अर्थात, सरकारें जो न्याय, शिक्षा, अर्थ शास्त्र, और सामजिक सद्भाव के लिए देश-वासियों से अधिकृत हैं, और असहाय नहीं कही जा सकतीं, भी हिंसक होती हैं। यदि हिंसा ही सरकारों का अन्तिम अस्त्र है तो फ़िर न्याय या शिक्षा के उपकरण, और सरकारी टोटके और कर्मकांड क्या निष्प्रभावी हो गए हैं? और यदि अस्त्र का उपयोग असहाय व्यक्ति के लिए ही न्यायोचित है, तो उस असहाय व्यक्ति की क्या पहचान है? यदि किसी भी देश में आतंक बढता है, और क्या इसका अर्थ यह लगाना चाहिए कि वहां असहाय व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है, और लोगों का अपनी सुरक्षा के लिए सामाजिक सद्भाव, न्याय, शिक्षा, और सरकारी कर्मकांड पर भरोसा नहीं रहा है?

आतंक का कारण क्या भय, असहाय व्यक्ति की असुरक्षा में की गई प्रतिक्रिया है, या लालच / अधिकार का प्रदर्शन या, नौकरी की मजबूरी या, निस्वार्थ अध्यात्मिक बल की चिंगारी है ? जो आतंक वादी नहीं हैं किंतु व्यवस्था में उनका विश्वास नहीं है और डर कर जी रहे हैं, क्या वे मर (आत्म हत्या कर ) गए हैं या उन्होंने भ्रष्ट हो कर, अव्यवस्था में जीने की आदत बना ली है, और प्रतिक्रिया करने में असहाय हैं? हमें यह भी सोचना चाहिए कि हर एक भारतीय व्यक्ति किस तरह आतंक की उपयोगिता और वीरता का भाव, अपराधी और भ्रष्ट व्यवस्था से अलग अलग समझता है? दोनों ही अस्त्र उठाते हैं, किंतु उनका भाव ही यह तय करता है कि वे वीर हैं, या अपराधी हैं, या उनका यह कार्य उनके नौकरी की मजबूरी है।

कारण - व्यक्तित्व - व्यवस्था के आधार पर आतंक (वीरता या अपराध) की परिभाषा अलग अलग होती है।
अस्त्र के उपयोग के ४ कारण हो सकते हैं।
१। लालच या अधिकार की लड़ाई - लूट या डरा कर पैसे कमाना। यह एक व्यापार है, जिसमें अपराधी उस पंडित की तरह होता है जो यह कभी नहीं चाहता कि उसका यजमान मर जाए। लालची लोग उस डाक्टर की तरह होते हैं जो अपने पास आए रोगी को न तो मरने देता है, और न ही उसे पूर्ण स्वस्थ ही होने देता है। यह सबसे खरतनाक कारण है, जिसमें अपराधी असमान समझौता (unequal agreement) करने में सफल हो जाता है। असवेदन शील सरकारी भ्रष्ट तंत्र या अपराधी संगठन इसके उदाहरण हैं।
२। अलगाव के लिए युद्ध। यहाँ अस्त्र का उपयोग इसलिए किया जाता है जिसमें असमान समझौते की व्यवस्था को, उससे अलग हो कर, समाप्त करने की चेष्टा होती है। यहाँ डाक्टर अपने रोगी को छोड़ना नहीं चाहता; किंतु रोगी, डाक्टर को बिना हानि पहुंचाए अलग होना चाहता है। अस्प्रश्यता या सामजिक अलगाव या स्वतंत्रता की क्रांति इसके उदहारण हैं।
३। आत्म-रक्षा के लिए अस्त्र का उपयोग। असहाय व्यक्ति एक सीमा के बाद या तो आत्म हत्या कर सकता हैं, या वह युद्ध करेगा। असहाय होना अलगाव होने से भिन्न है, क्योंकि वह अलग नहीं रह सकता। स्टाक मार्केट में पैसे खो चुके लोग, ग्रामीण स्थानों पर रह सकते हैं, किंतु वे मार्केट को न तो छोड़ सकते हैं, और न वहां रह सकते हैं। नौकरी की मजबूरी में पोलिस या शस्त्र -बल या हिंसात्मक संगठन में काम करने वाले, स्वामिभक्त होते हैं, देश भक्त नहीं। कालांतर में यही लोग लालची हो जाते हैं।
४। जो लोग असहाय या असंतुष्ट नहीं हैं, किंतु वे अध्यात्मिक रूप से इतने संवेदन शील हैं कि दूसरों पर अन्याय या अपराध को सहन नहीं कर सकते। ये लोग न तो लालची हैं, न अलगाव वादी, न ही व्यक्तिगत हानि से असहाय हैं, किंतु वे केवल निस्वार्थ और व्यक्तिगत आस्था के भरोसे ही अस्त्र उठाते हैं। संगठन और व्यक्तिगत स्वार्थ, इनके लिए आवश्यक नहीं है। ये लोग अपने स्वभाव को छोड़ नहीं सकते, और अपने जीवन या मृत्यु का अपमान करना नहीं जानते। उनके जीवन का उद्देश्य, जीवन से भी बड़ा होता है और मृत्यु अकारण ही नहीं होती। महाभारत में अभिमन्यु का चरित्र इसका उदाहरण है।

इस तरह, हमें यह ज्ञान होना चाहिए की आतंकवादी भी चार तरह के होते हैं। लालची आतंकवादी, अलगाववादी आतंकवादी, असहाय आतंकवादी और वीर आतंकवादी। अपराध एक सम्बन्ध (relative term) है, और चारों आतंकवादी एक दूसरे के लिए अपराधी होते हैं और यह युद्ध किन्ही भी दो अपराधियों के बीच होता है। युद्ध में कानून की भूमिका नहीं होती क्योंकि कानून की मृत्यु के बाद ही युद्ध का जन्म होता है।

भारतीय समाज में यह भ्रम है की हिंदू या मुस्लिम या सिक्ख आतंकवादी हो सकते हैं। मुस्लिम और हिंदू धर्म से अलग नहीं हैं, बल्कि इतिहास से अलग हैं। मुस्लिम शासकों का इतिहास आज उस असमानता की कीमत चुका रहा है, जिसके कारण मुस्लिम आज भी समाज में उचित प्रतिष्टा न पा सके और विकास से अलग हो गए। आज के नए शासक कल के दुर्भिक्ष बनेंगे। उदाहरण के लिए, एक वकील या दरोगा या पोलिस कर्मचारी या सरकारी अधिकारी को घर किराये पर मिलना मुश्किल होता है। प्राइवेट बैंक उन्हें लोन भी नहीं देते। लोग यह सोचते हैं की ये लोग अपनी ऊंची पहुँच से घर पर कब्जा कर लेंगे या उनसे किराया लेना मुश्किल होगा। कानूनी वेश में गैर कानूनी लोग, कालांतर में समाज से बहिष्कृत कर दिए जाते हैं। यही अस्प्रश्यता का सिद्धांत है। एक अच्छा मुस्लिम, एक अच्छा वकील या एक अच्छा पोलिस कर्मचारी इस लिए अभिशिप्त है, की वह कभी असमानता का प्रतीक रहा था या है। इन्हें अपना मान लेने में वक्त लगेगा। एक पोलिस की लड़ते हुए मृत्यु होने पर समाज में इतनी चिंता नहीं होती जितनी एक सामान्य व्यक्ति की दुर्घटना से हुयी मृत्यु की । आतकवादी का नाम समाज में जाना जाता है, किंतु एक पोलिस कर्मचारी का नाम उसके मृत्यु के बाद उसका स्वामी (जो सरकारी व्यवस्था है) भी नहीं जानता। निरपराध लोग जो आतंकवाद के शिकार होते हैं, वे हिंदू या मुस्लिम या सिख नहीं होते और न ही एक आतंकवादी, हिंदू या मुस्लिम या सिख हो सकता है।

सामाजिक असमानता और कुव्यवस्था ही आतंकवाद का कारण है जिनके बनाए चक्रव्यूह में अभिमन्यु फंस चुका है। सभी उसे देख कर चिंतित हैं, क्योंकि वह एक वीर आतंकवादी है। मुझे हर एक उस व्यक्ति से सहानुभूति है जो अपने जीवन के उद्देश्य को जीवन से बड़ा मानता है। कर्नल पुरोहित या प्रज्ञा ठाकुर के कृत्य को कानून अपराधी मानता है, किंतु ये व्यक्ति न तो लालची हैं, न ही अलगाव वादी, और न ही असहाय। इन्होने अपने स्वार्थ के लिए कुछ नहीं किया। कानून एक मशीन है और वह वही करता है जो उसका मालिक चाहता है। यदि इनकी मृत्यु भी होती है, तो भी वह अपमान जनक मृत्यु न होगी। यही अभिमन्यु का चरित्र है।

मैं यह मानता हूँ की इनका (प्रज्ञा और पुरोहित) चक्रव्यूह में घुसने का रास्ता उनके लिए ठीक हो सकता है किंतु अन्य लोगों के लिए ग़लत है। अभिमन्यु ने चक्रव्यूह का भेदन करने का जो मार्ग चुना था उस पर बाकी पांडव सेना नहीं जा सकी। यदि कौरव व्यवस्था को तोड़ना ही है तो वह रास्ता अपनाना चाहिए जिसका उपयोग सार्वजनिक हो और उनका मार्ग अनुकर्णीय हो।

भारतीय राजनीति का व्यापारी स्वरुप लालच पर आधारित है, इस लिए असहाय आतंकवादी बढ़ रहे हैं। जो लोग इस व्यवस्था का विरोध करते हैं किंतु उनसे लड़ने की हिम्मत नहीं है वे सभी भ्रष्ट समाज का अंग बन जाते हैं और अपनों से लड़ते हैं। युद्ध का स्वरुप भारत में आतंक है, क्योंकि यहाँ अमेरिका की तरह विश्वसनीय न्याय व्यवस्था नहीं है। अमेरिका में लोग कानूनी लड़ाई में अभ्यस्त हैं, इस लिए वहां आतंक वाद के चारो स्वरुप कानून के दायरे में है। वहां अभिमन्यु की मृत्यु चक्रव्यूह में नहीं होती।

भारत में नौकर शाही है। यहाँ नौकर ही मालिक को कानून या न्याय या रक्षा सिखाता है। जनता जो सरकार को चुनती है सरकार के नौकर उसी जनता को मजबूर करते हैं। जब जनता, सरकार और उसके नौकरों से अपना दिया गया अधिकार वापस ले लेती है, तब वह स्वयं न्याय, रक्षा, और सद्भाव की नयी परिभाषा बनाती है। जनतंत्र और नौकरशाही में विरोध के कारण, कुव्यवस्था बढती है, और असमानता के कारण आतंकवाद बढ़ता है।

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