अदृश्य देवताओं के विचारों को ध्यान से श्रवण करने वाला, और उस प्रभाव को संसार में प्रत्यक्ष देखने वाला वह व्यक्ति कौन है? कौन है वह, जो गुप्त ज्ञान की उस सम्पदा को छिपाए हुए, अपने सुहृदय और तीव्र बुद्धि के बल से प्रभावशाली लेखक या, साहित्यकार या शिक्षक बन जाता है। क्योंकि, केवल उसी नियत कार्य से वह व्यक्ति शांत और संतुष्ट रह सकता है। और जब तक वह गुप्त ज्ञान, पात्र लोगों तक नहीं पहुंचता, तब तक उसकी मुक्ति सम्भव नहीं। अध्यात्मिक अर्थात अधि - भौतिक और अधि - आत्मिक, या जो व्यक्ति भौतिक और आत्मिक लोकों के बीचों -बीच में स्थित है, उन शिक्षकों, साहित्यकारों और लेखक को मेरा नव वर्ष २००९ के आगमन पर अभिनंदन ।
कृष्ण गोपाल ५/१२/०९
कृष्ण अर्जुन संवाद
संवाद जिसे अंग्रेजी में कमुनिकेशन कहते हैं, किसी विचार, घटना, व्यवस्था या व्यक्ति का चित्रण मात्र नहीं है। संवाद का अर्थ है, सह वास या उप वास या उपासना (उप आसन) या, जिसे हिन्दी भाषा में, साथ रहना (सह वास), समीप में रहना (उप वास) या समीप में बैठना (उप आसन) भी कहते हैं। इन सभी शब्दों का अर्थ एक ही है।
संवाद एक दूसरे के बीच हो ही नहीं सकता, क्योंकि इस तरह समीप में बैठना (उपासना), जिससे दोनों की दृष्टि एक दूसरे को कभी न देखे बल्कि दोनों का एक स्थान से देखना या दृष्टि की एकाग्रता या समानता (अंग्रेजी में, पॉइंट्स आफ व्यू का अलाइन्मेंट ) की स्थिति ही संवाद है। उदाहरण के लिए, एक वस्तु या स्थिति को अलग अलग दृष्टि-कोण से देखा जाता है, और इस तरह देखने वालों का चित्रण और समझ अलग अलग हो जाते हैं। इन अलग अलग परिदृश्य (चित्रण) के कारण ही विभिन्न दर्शकों के बीच वाद -विवाद होता है और समझ में हुयी इस अविश्वास की कठिनाई से डर पैदा होता है, जिससे युद्ध तक भी हो सकते हैं। संवाद केवल तब होता है, जब दोनों की मानसिक स्थिति में समीपता होगी, और दृष्टिकोण, जिसे अंग्रेजी में पॉइंट आफ व्यू कहते है, एक हो जाता है। दृष्टिकोण के बदलने की क्रिया का ज्ञान, संवाद या उपासना या कमुनिकेशन के लिए आवश्यक है। जो अपना दृष्टि कोण बदल नही सकते और दूसरों को दृष्टि कोण दोष से बचा भी नही सकते, वे लाचार प्राणी डर कर युद्द करते हैं।
एक शिक्षक या साहित्यकार या लेखक या संत तभी प्रभावशाली बन पाते हैं जब उनका अपना कोई दृष्टिकोण नहीं होता। वे किसी भी व्यक्ति की उपासना अर्थात स्वतः उसके समीप जा कर उसके ही दृष्टिकोण से देख कर उससे संवाद करने में सफल हो जाते हैं। विचारों द्वारा चलने में असमर्थ व्यक्ति अपना दृष्टिकोण बदलने में असमर्थ होता है। एक लाचार या अपंग व्यक्ति की तरह वह केवल वही जान सकता है, जो उसे दिखेगा या उसे जिसका अनुभव है। इस लाचारी को अंहकार भी कहते हैं। अहंकारी व्यक्ति, एक फोटोग्राफर की तरह है, जो अपने चित्र से बंधा होता है, और लोग उसे उसके चित्र से ही जानते हैं। उपासना करने में, अहंकारी, इसलिए ही असमर्थ होता है। श्री कृष्ण ही केवल उपासक हैं। वे हर व्यक्ति के समीप जा, उसके दृष्टि कोण से ही देखने और समझने की योग्यता रखते हैं। श्री कृष्ण ने भगवत गीता का ज्ञान दे कर अर्जुन को इस योग्य बना दिया था जिससे वे दृष्टि कोण के बंदीग्रह से मुक्त हो सके और मोह या पूर्वग्रह या अंहकार को नष्ट कर, उन्हें अपने कर्म का बोध हुआ। अतः, अंहकार रहित श्री कृष्ण का कोई अपना दृष्टिकोण या निवास तो हो ही नही सकता। संवाद में दक्ष व्यक्ति ही प्रभाव शाली शिक्षक, संत, साहित्यकार, लेखक हो सकते हैं क्योंकि न तो उनका कोई दृष्टिकोण होता है, और न ही उन्हें अपने ज्ञान का अंहकार ही हो सकता है। उनकी बातों को समझ पाना भी आसन नहीं होता क्योंकि उनका दृष्टि कोण बदलता रहता है, जबकि वह स्वयं कभी नहीं बदलते।
स्वयं को जानते हुए, दृष्टिकोण बदलने में समर्थ और समस्त प्राणियों से उपासना या संवाद में लगे व्यक्ति, जिस साधन का प्रयोग करते हैं, उसे ज्ञान कहते हैं। ज्ञान से, अंहकार अर्थात चलने या स्थिति परिवर्तन की असमर्थता, या दृष्टिकोण के न बदल न पाने की असमर्थता नष्ट होती है। ज्ञान को साधन बना कर अंहकार से मुक्ति पाने की इस क्रिया को साधना कहते हैं। श्री कृष्ण एक साधक हैं जो सदैव साधना या मानसिक यात्रा में ही रहते हैं। अनिकेत या जिसका कोई निवास स्थान न हो, अर्थात उसका अपना कोई दृष्टिकोण न हो, वही उपासक (या उपासना में समर्थ व्यक्ति) श्री कृष्ण हैं। कृपया जानें, कोई कैसे अपने ही दृष्टिकोण के बंदीग्रह से मुक्त हो और वह किस तरह समस्त प्राणियों से संवाद कर सकेगा। यही रहस्य है, क्यों एक शिक्षक या साहित्यकार या संत को उसके व्यक्तित्व, वस्तु या विषय या चित्रण के द्वारा कभी जाना नही जा सकता।
आसन का अर्थ शारीरिक अभ्यास नहीं है। साधना या दृष्टिकोण बदलने की क्रिया में दृष्टा की स्थिति भी बदलती रहती है। स्मृति एक जड़ता है जिसे अंग्रेजी में इनर्शिया कहते हैं। स्मृति के कारण द्रष्टा की दिशा या गति में अपरिवर्तनशीलता या स्थिरता या जड़ता आ जाती है। यह प्रकृति का प्रभाव है। आसन के दृढ होने का अर्थ है स्मृति के प्रभाव से ज्ञान (साधन) की रक्षा। आसन के अभ्यास से स्मृति नष्ट नहीं होती बल्कि स्मृति ज्ञान में सहायक हो जाती है। आसन को अंग्रेजी भाषा में डिसिप्लिन कहते हैं, जिसे हिन्दी और संस्कृत में अनु शासन कहते हैं। स्वयं पर शासन को अनु शासन कहते हैं। इस कारण ही आसन पर दृढ होना या अनुशासन, साधना या साधन पर बैठ कर यात्रा, को सरल बना देता है। डर का कारण पूर्वाग्रह है। सांप से डरने का कारण सांप के प्रति हमारी ग़लत धारणा है। समय साक्षी है किस तरह इतिहास के दुरूपयोग से ही सदैव युद्ध होते आए हैं। स्मृति में हुए लगातार प्रदूषण या स्मृति दोष के कारण ही डर पैदा होता है। डर ही, जड़ता या इनर्शिया का कारण है जिससे व्यक्ति अंपने दृष्टिकोण को छोड़ नही पाता और अहंकारी बन कर जीता है। अनु-शासन से व्यक्ति की बुद्धि, स्मृति को पवित्र करती है; और उस स्मृति स्थल पर वह शुद्ध आध्यात्मिक आसन बनता है, जहाँ श्रम, डर या हिंसा या प्रतिक्रिया की आवश्यकता नहीं होती, और ध्यान (उपासना की योग्यता) स्वतः सुलभ हो जाती है। प्रकृति के अनुसार कर्म से श्रम / अरुचि का अभाव हो जाता है, और यही आश्रम है। अध्यात्मिक एक अवस्था है जिसमें व्यक्ति एक ही समय में अधि- भौतिक और अधि-आत्मिक (दोनों लोकों के बीच में स्थित) होता है।
योग का अर्थ है पूर्णता, या अलग न होना। योग, युग, यज्ञ या विनियोग, आत्मशुद्धि की क्रिया है। सत् युग अर्थात सत्य का अनुभव, या सच्चाई, निस्वार्थ या प्रेम से जुड़ना। प्रकृति और पुरूष का भेद ही द्वापर युग है। पुरूष का प्रकृति के तीनो गुणों का ज्ञान ही त्रेता युग है। कल युग अर्थात ज्ञान के प्रकाश का न होना, और अंहकार, तर्क व् अविश्वास से जुड़ना। समय और काल की अनुभूति जुडाव की विभिन्न प्रकृति पर निर्भर है । समय, दो धटनाओं के बीच का नाप तौल का प्रमाण नहीं होता। ज्ञान से ही योग होता है। यदि आपकी पेन्सिल खो गई है, तो, उसकी पुनः प्राप्ति में लगने वाले समय को आप कैसे जान सकते हैं? जब तक स्मृति या खोज की विधि का ज्ञान नही होगा, तब तक घड़ी द्वारा समय देखते रहने से, पेन्सिल की प्राप्ति (का युग या योग) कभी भी नही होगा। इसी तरह, सत् युग का आना ज्योतिष (ग्रहों की गति से समय के आकलन ) द्वारा समय की प्रतीक्षा करने से कभी पूरा नहीं हो सकता। जबकि ज्ञान से व्यक्ति या समाज का युग परिवर्तन कभी भी हो सकता है। किसी दो घटना या दो व्यक्ति के दृष्टिकोण का मेल कभी शीघ्र हो जाता है, और कभी उसमें बहुत समय लगता है, इस लिए समय की परिभाषा, युग (प्राप्ति, अर्थात मिलने) पर निर्भर है, उसके बीच की दूरी या नाप पर निर्भर नहीं। योग या आत्म ज्ञान के लक्ष्य की प्राप्ति का सुगम मार्ग ही शास्त्र कहलाता है और वहां, काल या समय अपनी नाप तौल पर निर्भर नहीं होता। प्रकाश की गति, सूर्य या घड़ी समय के नाप के विभिन्न साधन हैं, किंतु इनसे समय की परिभाषा नहीं बन सकती।
योग का अर्थ है, जोड़ या जुड़ना लेकिन सभी से और, सभी समय जुड़े रहना और ध्यान और चिंतन की विविधता का विस्तार। अविश्वास, द्वेष, विस्मृति, त्याग या अलगाव कभी योग नही हो सकते। बल्कि, श्री कृष्ण ने अर्जुन को स्मृति के पुनर्प्राप्ति पर बधाई दिया। एक उदाहरण के लिए एक माँ घर में एक ही समय बहुत बातों पर एक साथ ध्यान देती है। खाना बनाते हुए, वह बच्चे पर उतना ही ध्यान रखती है, टीवी भी देखती है, और घर में आने-जाने वाले पर भी बराबर ध्यान रखती है। इस जोड़ में कोई बंधन नहीं है किंतु प्रेम है। अतः, यही योग है। दृष्टिकोण की व्यापकता की इस स्थिति को ही योग कहते हैं। अंग्रेजी में इसे दृष्टिकोण को वान्टेज पॉइंट कहते हैं, जहाँ सारे दृष्टिकोण एक हो जाते हैं। हिन्दी और संस्कृत में ज्ञान की इस व्यापकता को सत्य कहते हैं। सत्य और अहिंसा और योग एक ही शब्द के अर्थ है। क्योंकि दृष्टिकोण की जड़ता (या अंहकार) ही हिंसा या वैमनस्य का कारण है, और ज्ञान की साधना से जब इस अंहकार से मुक्ति मिलती है तब सत्य का मार्ग मिलता है । अंहकार या दृष्टिकोण की बंदीग्रह से मुक्ति ही मुक्ति है, और इसी अंहकार के त्याग से प्रेम या सत्य या योग की प्राप्ति होती है।
श्री कृष्ण योगेश्वर हैं। उनका कोई शरीर, नाम या निवास या दृष्टिकोण नहीं है, क्योंकि वे अनंत हैं। सभी प्राणियों के उपासक वे ही हैं क्योंकि वे ही सत्य में स्थित हैं। ज्ञान, उपासना की विधि, संवाद, योग, नित्य, सत्य आदि शब्दों के नियंता भी वे ही हैं। इन शब्दों का अर्थ जानने से बुद्धि को शक्ति मिलती है, और वह स्वयं सतर्क हो कर इसका प्रयोग कर सकता है। शब्द ही अक्षर (जिसका क्षय या नाश नही होता) ब्रह्म हैं। श्री गुरु नानक देव जी ने शब्द कीर्तन की बड़ी महिमा बताई क्योंकि इन महान शब्दों का अर्थ बार बार जानने से ही बुद्धि को उसके उपयोग की शक्ति मिलती है।
कृष्ण गोपाल
७/११/०८
भ्रम और संगठनात्मक व्यवस्था
जो संवाद करने अर्थात दृष्टिकोण बदलने में असमर्थ, या दूसरों के दृष्टिकोण को अपना नहीं बना सकते, वे वाद-विवाद या तर्क से जुड़ते हैं, और अंपने दृष्टिकोण को स्थिर रखते हैं। अलग अलग दृष्टिकोण से ज्ञान की प्राप्ति का सामूहिक प्रयास ही व्यवस्था कहलाता है। इसमें व्यक्ति जड़ हो जाता है, और उसकी पहिचान उसके दृष्टिकोण या अंहकार से ही होती है। अलग अलग स्थान से देखने वालों के बीच हुए बात को ठीक से समझ कर, तर्क के द्वारा ज्ञान की एक रूप रेखा बनाई जाती है; । किंतु यदि एक नया व्यक्ति किसी नए दृष्टिकोण से उसे देखेगा और उसकी एक बात से, अभी तक का प्राप्त ज्ञान सही नही रहता, और इस तरह नए ज्ञान का जन्म होता है। यहाँ प्रमाण, तर्क या अविश्वास, ज्ञान की परीक्षा का एक मात्र प्रबल साधन है, और उपासना या विश्वास का स्थान नहीं होता। रिलेटिविटी का यही सिद्धांत है। इस से सनातन ज्ञान की प्राप्ति सम्भव नहीं है। इसके विपरीत, संवाद में, व्यक्ति का दृष्टिकोण हमेशा बदला जा सकता है, और उन्हें उनके किसी एक दृष्टिकोण से नहीं पहिचाना जा सकता, अतः उनका कोई अंहकार हो ही नहीं सकता। संवाद में योग (जुडाव) हो जाने से, किसी को किसी से किसी अपेक्षा या प्रतिफल की आवश्यकता ही नहीं होती, इसलिए युद्ध संवाद का विषय नहीं है।
भ्रम, दृष्टि कोण दोष के कारण हुए असफलता, को व्यवस्था की शक्ति से नियंत्रित करने का प्रयास है। अर्थात भ्रम एक व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति को दृष्टि-कोण बदलने की जरूरत नहीं होती, और सबको एक दूसरे पर निर्भर रह कर नियंत्रण द्वारा समाज बनता है। यहाँ अंहकार एक लाचारी नहीं बल्कि दृष्टि - कोण को बिना बदले कित्रिम व्यवस्था के द्वारा हर एक के भ्रम की रक्षा की जाती है। महा-भारत में, भीष्म का चरित्र भ्रम में रहने की यही निष्ठां है। भ्रम, एक दृष्टिकोण से बना चित्र या व्यवस्था के नियम है, जिसे बदलना कभी आसान नहीं होता। भीष्म प्रतिज्ञा, व्यक्ति के अपने दृष्टिकोण में बदलाव की असमर्थता का प्रतीक है। व्यवस्था जिसे अंग्रेजी में मनेजमेंट कहते हैं, एक नियंत्रण की वह विधा है जिस में हर एक का अलग अलग दृष्टिकोण होता है, किंतु वे उसे बदलने में असमर्थ या न चाहते हुए कित्रिम विधि से काम चलाते है। विदुर और ध्रतराष्ट्र दोनों ही भीष्म के प्रिय थे। विदुर, भीष्म से तर्क करता था, और सही - ग़लत की व्याख्या करने में समर्थ था, इसलिए भीष्म का मन विदुर के पक्ष में हमेशा था। धृत राष्ट्र , तर्क से सतर्क, या संवेदन शील नहीं था, या वह दृष्टिहीन था, किंतु संगठनात्मक व्यवस्था के बल से शक्तिशाली था। आज के युग में, सुप्रीम कोर्ट के जज जो राष्ट्र अर्थात महाभारत की संरचना के लिए बने सिद्धांत (संविधान, कांस्तितुशन ऑफ़ इंडिया) के निष्ठां से बंधे हैं, वे ही भीष्म हैं। उनकी निष्ठां भारत के संविधान के प्रति है, और जिसे वह जीवन पर्यंत छोड़ नही सकता। दुर्भाग्य है, ये जज कुछ भी नही कर सकते क्योंकि वे जिन आँखों से महा भारत अर्थात विश्व के प्रसार को देखते हैं वह सरकारी तंत्र अर्थात धृत राष्ट्र (व्यवस्था के नियम जिस पर राष्ट्र आधारित है ) अँधा है। धृत राष्ट्र के चरित्र के बारे में आगे चर्चा होगी। भारत में रहने वाले स्वतंत्र विचारक, समाज सेवी या निस्वार्थ कार्य करने वाले संवेदन शील प्राणी ही विदुर हैं, वे जब भी समाज की समस्या लेकर सुप्रीम कोर्ट में जाते हैं, तब भीष्म का मन प्रसन्न हो उठता है। किंतु, धृत राष्ट्र का मन अपने ही भाई विदुर से हमेशा मैला रहता है। सरकारी लोग हमेशा कानून का दुरूपयोग करना चाहते हैं, धृत राष्ट्र इसलिए ही विदुर के कटाक्ष से बचना चाहता है। धृत राष्ट्र न चाहते हुए भी, विदुर को राष्ट्र से निकाल नहीं सकता; क्योंकि दोनों ही भीष्म से रक्षित हैं। हालाँकि भीष्म से मजबूर कोई भी नहीं है, क्योंकि वह उस राष्ट्र की रक्षा करता है, जिसके दोनों पुत्र (धृत राष्ट्र और विदुर) एक मत नहीं हैं, और वह ख़ुद अपनी प्रतिज्ञा से बंधा है, और धृत राष्ट्र को छोड़ नहीं सकता। इस मजबूर भीष्म का कभी अपमान नहीं किया जा सकता क्योंकि वह सब कुछ जानता है, किंतु असमर्थ है, और उसे प्रतिदिन तीव्र अस्त्र की शैय्या पर सोना पड़ता है।
दृष्टिहीन होना नियंत्रण की व्यवस्था के लिए अति -आवश्यक है। असम्वेदनशील व्यक्ति ही व्यवस्था का नियंत्रक हो सकता है क्योंकि वह कित्रिम कानून की रक्षा करके ही उसका नियंत्रण बनाये रख सकता है। कानून का अँधा होना इसलिए ही आवश्यक है। कानून और व्यवस्था जिस पर राष्ट्र स्थिर होता है, उसे संस्कृत में धृत - राष्ट्र कहते हैं। धृत अर्थात जो धारण करता है, और राष्ट्र जो व्यवस्था द्वारा बनायी गई सामाजिक रचना है। महा भारत में धृत-राष्ट्र का चरित्र उसके अध्यात्मिक अंधेपन जो भीष्म अर्थात कानून और व्यवस्था के भ्रम से पोषित है, का द्योतक है। धृत राष्ट्र यद्यपि अँधा है किंतु वह जानता सब है। संजय द्वारा अर्थात मर्यादा के पालन के लिए विवश किए जाने पर, वह अध्यात्मिक दृष्टि से महाभारत के युद्ध को सद्दैव ही देखता है।
दृष्टिहीन धृत-राष्ट्र और भ्रम के पोषक भीष्म के राष्ट्र रचना में, अन्य पात्र हैं। " दुर्योधन " (दुर्र-योधन ) अर्थात कानूनी अधिकार द्वारा शासन के शक्तियों का निरंकुश दुरूपयोग जिसे अंग्रेजी में बैद अथॉरिटी को कहते हैं। " दुश्शासन" (द्दुस -शासन) या कु-शासन जिस का अंग्रेजी अनुवाद है बैद गोवेर्नांस। अथोरिटी या गोवेर्नांस के लिए अच्छा शब्द विशेषण में नही लग सकता क्यंकि नियंत्रण कभी अच्छा या निर्जीव नही रह सकता। " कर्ण " शब्द वह है जो अंग देश का शासक है अर्थात नियंत्रण करने का ढांचा या शरीर या अंग या सरकारी तंत्र (गोवेर्नांस स्ट्रक्चर ) है जो अपने पहिचान के बदले, दुर्योधन और दुश्शासन के ऋण को चुकाने के लिए बद्ध है। सरकारी लोग जो भय के प्रतीक हैं, जैसे पोलिस या टैक्स अधिकारी या मुनिसिपलिटी के अधिकारी ही दुर्योधन हैं। न्याय व्यवस्था या सड़क, बिजली, पानी या रक्षा के संगठन के मद से अमानुषी लोग ही दुश्शासन हैं। व्यवस्था के लिए संवेदन हीन क़ानून बनाने वाले मंत्री या संसद या राजनीती के लोग ही धृत राष्ट्र हैं जिन्हें संविधान (भीष्म) ने पैदा किया है। जो लोग सिर्फ़ पेट भरने और अपनी पहिचान के लिए अपनी निष्ठां को बेच चुके हैं अर्थात ऋण चुकाने के लिए धृत राष्ट्र, दुर्योधन और दुश शासन से जुड़े हैं वे ही प्राणी "कर्ण" हैं। हर संगठन चाहे वह राष्ट्र हो, परिवार, या व्यावसायिक संगठन हो, या राजनीतिक या, अन्य, ये सभी पात्र वहां मिलेंगे ।
" द्रोणाचार्य" (द्रोण +आचार्य ) वह शिक्षक है जिसका आचरण दो अलग अलग हैं। अर्थात, वह शासक का अन्न खाकर उन लोगों को अस्त्र का प्रयोग सिखाता है जिनकी मानसिकता से वह बेपरवाह है। बाज़ार की व्यवस्था के पेशेवर जैसे, तकनीक के शिक्षक या डाक्टर या वकील जो सरकार (धृत राष्ट्र) के अंग नहीं है किंतु उन पर निर्भर हैं, और उनके आचरण भी दो होते हैं। उन पर कभी आँख बंद करके भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि बाज़ार, आपका शत्रु और मित्र दोनों हैं, और उनके स्वभाव स्थिर नहीं होते। अश्वत्थामा, तकनालोजी या मशीनी युग का प्रतीक है जिसके उपयोग द्वारा कोई बल तो प्राप्त कर सकता है, बुद्धि नहीं। उदाहरण के लिए, बन्दूक या अस्त्र जिसकी रचना भौतिक शास्त्र के ज्ञान द्वारा होती है, किंतु उसके इस्तेमाल के लिए भौतिक ज्ञान में पंडित होना जरूरी नहीं है। मूर्ख व्यक्ति भी टेक्नोलोजी के हाथ आने पर बलशाली हो जाता है। टेक्नालोजी या अश्वत्थामा, अपने पिता, द्रोण आचार्य (जो बिना परिणाम को जाने शिक्षा या तकनीक का व्यवसाय करता है) की व्यावसायिक रचना है। द्रोणाचार्य के मृत्यु का कारण भी अश्व-थामा के मृत्यु का समाचार का शोक ही बना। इसका अर्थ है जो अस्त्र को बनाते हैं, उनकी मृत्यु भी उन्ही अस्त्रों के शोक से ही होती है। ऐ के ४७ बन्दूक का निर्माता रशियन आविष्कर्ता अपने ही अस्त्र के दुरूपयोग के शोक से मर गया था। अमेरिका जिस ने आण्विक अस्त्र का पहिला उपयोग किया, आज वही उसका शिकार बन सकता है। शकुनी शब्द बाजार की गणित पर शासकीय नियंत्रण और छल की निति का द्योतक है, जो अर्थ व्यवस्था में लोगों को उलझाने रखने और लालच की शक्ति को भली भांति जानता है। वित्तीय संस्थाएं, या बैंक ही शकुनी हैं। सारा महा भारत का युद्ध अर्थात बाज़ार शकुनी की ही देन है। युधिष्ठिर अर्थात जो युद्ध में स्थिर रहने की क्षमता रखता है, या धर्म पर रहता है, और विचलित नहीं होता, वह भी, बाज़ार के छल जिसका भरोसा निष्पक्ष गणित देता है, सब कुछ हार जाता है। भीष्म भी युधिष्ठिर की सहायता नहीं कर सकता क्योंकि व्यवस्था के खेल के नियम का अधिष्ठाता धृत राष्ट्र है, और वह भय (दुर्योधन), असम्वेदन शीलता (दुश्शासन) और लालच (शकुनी) पर निर्भर है। " कृपा-चार्य" शब्द उस चरित्र का परिचय है जो लोगों को अपर्याप्त मदद देकर लोगों का शासन के लिए भरोसा प्राप्त करता है और उन्हें शासन पर निर्भर बनाये रखने में सफल हो जाता है। द्रोणाचार्य और क्रिपाचार्य दोनों व्यावसायिक भाई हैं; एक, अस्त्र चलाना और युद्ध नीति सिखाता है, और दूसरा, अस्त्र से घायल हुए व्यक्ति को दवा देने की कृपा करके ठीक करता है। " जयद्रथ" वह शक्ति है जो पराजय को जीत बता कर, अश्लील दुष्प्रचार के द्वारा शासन की शक्ति को बनाये रखता है। जयद्रथ ने ही शेष पांडवों की सेना को अभिमन्यु के चक्रवियुह भेदन के समय, पीछे पीछे आने से रोका था। इसका अर्थ है की दुष्प्रचार की अधिकता से मनुष्य को अनुकर्णीय कार्य से रोक देना। जयद्रथ का ही प्रभाव है की आज भी भारत में जो व्यक्ति अकेले ही व्यवस्था से लड़ता है, किंतु सही व्यक्ति है, उसका लोग साथ नही देते हैं।
बिदुर वह है जो धृत राष्ट्र की तरह ही व्यवस्था का ज्ञाता है किंतु उसका दृष्टिकोण तर्क से शुद्ध है, और वह व्यवस्था के बुराई के विरुद्ध है। भीष्म को धृतराष्ट्र और बिदुर दोनों का सम्मान मिलता रहता है, इस लिए भ्रम की शक्ति में अच्छाई की सीमित मात्रा भी होती है।
अमेरिका में व्यक्ति महत्वपूर्ण है, संगठन नहीं। उसके संविधान में डकैत, लुटेरे और विचारक और संतों के भी दस्तखत हैं। संगठन भी एक माध्यम है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति के उत्तरोत्तर चरित्र के निर्माण के लिए होना चाहिए। इसलिए, संगठन के द्वारा विकास की सम्भावना हो भी सकती है, और नहीं भी। संगठन और समाज अलग अलग शब्द हैं। समाज, व्यक्ति की स्वतंत्रता और मौलिकता का प्रतीक है, वहां नियंत्रण नहीं होता और ज्ञान के द्वारा चरित्र निर्माण होता है। समाज (व्यक्ति की मौलिकता ) और संगठन (नियंत्रण) का युद्ध चलता रहता है, और राष्ट्र हित में यही ठीक है।
भारत के धर्म शास्त्र सांकेतिक चरित्रों द्वारा इस सत्य और सनातन ज्ञान को उसी तरह संभालते हैं, जैसे फिसिक्स के गणितीय फार्मूला के विभिन्न पात्र जिसके अलग अलग समय और स्थान पर हुए प्रयोग ही इतिहास बनते हैं, और वे अनंत काल तक लिखे जा सकते हैं। यही गीता का रहस्य है। फिसिक्स की तरह ही सांकेतिक भाषा में लिखा गया श्रीमद भगवत गीता सनातन है। यह समझना जरूरी है। पूजा करने के ढोंग के बजाय उसका अर्थ जान लेना जरूरी है। मुंबई कांड का आतंक वादी कसब भी पाँच समय रोज नमाज पढता है। इसी तरह मंदिरों में होने वाली भारी भीड़, पंडितों के दुकान या पंडों का कर्म कांड, या मंदिरों की तरह ही कोर्ट में फैले वकीलों के खोमचे, या पुराने पंडितों की कर्म कांड के बदले, आज के सरकारी कर्म कांड कभी भी धर्म का प्रतीक नहीं हो सकते। व्यक्ति को अपने स्वभाव में ज्ञान द्वारा परिवर्तन करने की आंतरिक क्रिया ही धर्म है।
भारत में द्रोणाचार्य किस्म के पंडित जिसे "धर्म निर्पेक्ष्य" कहते हैं, उसका सही अर्थ होता है "संगठन निर्पेक्ष्य" अर्थात वह राष्ट्र जहाँ हरएक व्यक्ति के मौलिकता और सह अस्तित्व के अधिकार की रक्षा होती हो। आज तक भारत में सुप्रीम कोर्ट के जजों ने (अर्थात भीष्म ने) अपनी मर्यादा को जानते हुए कभी भी अपने को इस योग्य नही समझा किवे वे धर्म को पारिभाषित कर सकते हैं जबकि वे दिन रात संविधान की निष्ठां से बंधे रह कर, नई नई परिभाषा करते ही रहते हैं। यह उनकी कृष्ण भक्ति है। अमेरिका के जज तो न्याय की प्रक्रिया से भी अपने को दूर रखते हैं, और केवल शब्दों की परिभाषा और अर्थ की व्याख्या करते हैं। तरह तरह के कोर्ट जो हर गली कूचे में पाए जाते हैं वहां ही झगडे लडाई का न्याय हो जाता है, क्योंकि वहाँ परिभाषा पर विवाद नहीं होता। अंग्रेज और अमेरिकी कानून विशेषज्ञ, शब्द ज्ञान के ही पंडित होते हैं और उसे सरल बना देते हैं जिससे न्याय प्रक्रिया बाधित न हो। संविधान का रक्षक भीष्म एक लाचार, किंतु उदार व्यक्तित्व है, उसका धर्म निष्ठां की पूर्ति है; जबकि संगठन (धृत राष्ट्र ) इतना उदार कभी नहीं होता। आज के भारत में जहाँ शिक्षा का बुरा हाल है और भाषाएँ भी अधिक हैं, वहां कानून को इसलिए कठिन बनाया जाता रहा है की वह भय और नियंत्रण का कारण बने, और उसका ज्ञान वकील या पंडितों के बिना प्राप्त न हो सके। भारत की गिनती महा भ्रष्ट सरकार वाले देशों में की जाती है। यहाँ तक की अमेरिका और ब्रिटेन के लोग जो शिक्षा में भारत से पीछे नही रहे हैं, यहाँ व्यवसाय करने को डरते हैं। हिंदू, मुस्लिम, उत्तर प्रदेश, बिजली बिभाग आदि संगठन के नाम जीवन शैली, राजनीतिक, क्षेत्रीय, भाषा या व्यावसायिक आधार पर बनाये गए हैं, किंतु भारत का संविधान "संगठन निर्पेक्ष्य" है।
कृष्ण गोपाल

4 comments:
wah nice post
हिन्दी ब्लॉग जगत में आपका हार्दिक स्वागत है, शुभकामनायें हैं… एक अर्ज है कि कृपया डेशबोर्ड में जाकर वर्ड वेरिफ़िकेशन हटा दें, यह टिप्पणी देने में बाधक बनता है… धन्यवाद
आपने बहुत अच्छा लिखा है ।
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहिए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लिए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
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आर्ट के लिए देखें
www.chitrasansar.blogspot.com
आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लाग जगत में स्वागत है.....आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्त करेंगे .....हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
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